परिचय (Parichay)
Ras Kise Kahate Hain: रस (Ras) हिंदी काव्यशास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय तत्व है। कक्षा 9 से 12 तक हिंदी साहित्य में, TET, CTET, UPSC, NET, DSSSB, RPSC जैसी परीक्षाओं में रस से संबंधित प्रश्न 8 से 15 अंक तक आते हैं।
रस के बिना काव्य अधूरा माना जाता है। आचार्य भरतमुनि ने सबसे पहले रस की परिभाषा दी और कहा कि “रस ही काव्य की आत्मा है”। आधुनिक कवियों और आलोचकों ने भी रस को काव्य का मूल तत्व माना है।
इस आर्टिकल में हम रस किसे कहते हैं, रस की परिभाषा, रस के प्रकार, स्थायी भाव, विभाव-अनुभाव-संचारी भाव, उदाहरण, परीक्षा टिप्स और FAQ तक सब कुछ विस्तार से समझेंगे।
रस किसे कहते हैं? (Ras Kise Kahate Hain)
रस वह आनंद या अनुभूति है जो पाठक या श्रोता के मन में काव्य पढ़ने/सुनने से उत्पन्न होती है। जब कविता में भाव, अलंकार, छंद और भाषा का ऐसा संयोग होता है कि पाठक का मन रस में डूब जाता है, तो वह रस कहलाता है।
सरल शब्दों में: रस = काव्य पढ़ने से मिलने वाला विशेष आनंद या भावानुभूति।
रस की परिभाषा (Ras Ki Paribhasha)
भरतमुनि (नाट्यशास्त्र) – सबसे प्रसिद्ध परिभाषा “विभावानुभाव-व्यभिचारी-संयोगाद् रसनिष्पत्तिः” अर्थ: विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
मम्मट (काव्यप्रकाश) “रसो वै सः” – रस ही वह है (काव्य की आत्मा)।
विश्वनाथ (साहित्यदर्पण) “रसात्मकं वाक्यं काव्यम्” – रस से युक्त वाक्य ही काव्य है।
परीक्षा में याद रखने योग्य सबसे छोटी परिभाषा: रस = विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से उत्पन्न होने वाला आनंद।
रस के स्थायी भाव (Ras Ke Sthayi Bhav)
रस के मूल में स्थायी भाव होते हैं। ये भाव काव्य में स्थिर रहते हैं और रस बनाते हैं।
| रस का नाम | स्थायी भाव | उदाहरण भाव |
|---|---|---|
| श्रृंगार रस | रति (प्रेम) | प्रेम, विरह, मिलन |
| हास्य रस | हास (हँसी) | हास्य, मजाक |
| करुण रस | शोक (दुख) | दुख, वियोग |
| रौद्र रस | क्रोध | क्रोध, गुस्सा |
| वीर रस | उत्साह | उत्साह, वीरता |
| भयानक रस | भय | डर, भय |
| बीभत्स रस | जुगुप्सा (घृणा) | घृणा, घिन |
| अद्भुत रस | विस्मय | आश्चर्य, चमत्कार |
| शांत रस | निर्वेद / शम | शांति, वैराग्य |
रस के प्रकार / भेद (Ras Ke Prakar / Bhed)
हिंदी काव्यशास्त्र में मुख्य रूप से 9 रस माने जाते हैं (कुछ आचार्यों ने 10वाँ रस भक्ति या वात्सल्य भी जोड़ा है)।
- श्रृंगार रस – प्रेम और सौंदर्य का रस उदाहरण: “राधा-कृष्ण की प्रेम-लीला” (सूरदास)
- हास्य रस – हँसी का रस उदाहरण: “कबीर के दोहे में व्यंग्य”
- करुण रस – दुख का रस उदाहरण: “राम-विवाह के बाद सीता का वनवास”
- रौद्र रस – क्रोध का रस उदाहरण: “राम-रावण युद्ध”
- वीर रस – उत्साह और वीरता का रस उदाहरण: “कामायनी में मनु का संघर्ष”
- भयानक रस – भय का रस उदाहरण: “राक्षसों का वर्णन”
- बीभत्स रस – घृणा का रस उदाहरण: “मांसाहार का वर्णन”
- अद्भुत रस – आश्चर्य का रस उदाहरण: “कृष्ण का विश्वरूप दर्शन”
- शांत रस – शांति और वैराग्य का रस उदाहरण: “कबीर और तुलसी के भक्ति पद”
- वात्सल्य रस
- भक्ति रस
(1) श्रृंगार-रस(shringar ras)
श्रृंगार रस को रसराज की उपाधि प्रदान की गई है।
इसमें नायक नायिका के मिलन और विरह वेदना की स्थिति होती है।
इसके प्रमुखत: दो भेद बताए गए हैं:
(i) संयोग श्रृंगार – जब नायक-नायिका के मिलन की स्थिति की व्याख्या होती है, वहाँ संयोग श्रृंगार रस होता है।
(ii) वियोग श्रृंगार (विप्रलम्भ श्रृंगार) – जहाँ नायक-नायिका के विरह-वियोग, वेदना की मनोदशा की व्याख्या हो, वहाँ वियोग श्रृंगार रस होता है।
(2) हास्य रस (hasya ras)
किसी व्यक्ति की अनोखी विचित्र वेशभूषा, रूप, हाव-भाव को देखकर अथवा सुनकर जो हास्यभाव जाग्रत होता है, वही हास्य रस कहलाता है।
बरतस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय
सौंह करै भौंहन हंसै दैन कहै नटिं जाय।।
यहाँ पर कृष्ण की मुरली को छुपाने और उसे माँगने पर हंसने और मना करने से हास्य रस उत्पन्न हो रहा है।
(3) करुण रस (Karun Ras)
प्रिय वस्तु या व्यक्ति के समाप्त अथवा नाश कर देने वाला भाव होने पर हृदय में उत्पन्न शोक स्थायी भाव करुण रस के रूप में व्यक्त होता है।
अभी तो मुकुट बँधा था माथ,
हुए कल ही हल्दी के हाथ।
खुले भी न थे लाज के बोल,
खिले थे चुम्बन शून्य कपोल।
हाय! रुक गया यहीं संसार,
बना सिन्दूर अनल अंगार ।
यहाँ पर एक सुहागन के बारे में बताते हुए कह रहे है की अभी तो उसके हाथों में हल्दी लगी थी और बोलने में भी शर्म थी। उसके माथे का सिंदूर इसके पति के मरने के कारण लाल आंगर बन गया है।
इसलिए यहाँ पर करुण रस है।
(4) वीर रस(veer ras ki paribhasha)
युद्ध अथवा शौर्य पराक्रम वाले कार्यों में हृदय में जो उत्साह उत्पन्न होता है, उस रस को उत्साह रस कहते है।
हे सारथे ! हैं द्रोण क्या, देवेन्द्र भी आकर अड़े,
है खेल क्षत्रिय बालकों का व्यूह भेदन कर लड़े।
मैं सत्य कहता हूँ सखे! सुकुमार मत जानो मुझे,
यमराज से भी युद्ध में प्रस्तुत सदा जानो मुझे।
यहाँ पर श्री कृष्ण के अर्जुन से कहे गए शब्द वीर रस का कार्य कर रहे है।
वीररस के चार भेद बताए गए है:
- युद्ध वीर
- दान वीर
- धर्म वीर
- दया वीर।
(5) भयानक रस(Bhayanak Ras ki Paribhasha )
जब हमें भयावह वस्तु, दृश्य, जीव या व्यक्ति को देखने, सुनने या उसके स्मरण होने से भय नामक भाव प्रकट होता है तो उसे भयानक रस कहा जाता है।
नभ ते झपटत बाज लखि, भूल्यो सकल प्रपंच।
कंपित तन व्याकुल नयन, लावक हिल्यौ न रंच ॥
इस वाक्य में वातावरण के अचानक बदलने और शरीर में कम्पन और आंखों में व्याकुलता के द्वारा भयानक रस दिखाया गया है।
(6) रौद्र रस(Raudra Ras)
जिस स्थान पर अपने आचार्य की निन्दा, देश भक्ति का अपमान होता है, वहाँ पर शत्रु से प्रतिशोध की भावना ‘क्रोध’ स्थायी भाव के साथ उत्पन्न होकर रौद्र रस के रूप में व्यक्त होता है।
श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे ।
सब शोक अपना भूलकर करतल-युगल मलने लगे ॥
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े।
करते हुए घोषणा वे हो गये उठकर खड़े ॥
उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा।
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा ॥
मुख बाल-रवि सम लाल होकर ज्वाल-सा बोधित हुआ।
प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ ॥
यहाँ पर श्री कृष्ण की निंदा और अपमान सुनकर कृष्ण में रौद्र रस्बकी उत्पत्ति होती है।
(7) वीभत्स रस (Vibhats Ras)
घृणित दृश्य को देखने-सुनने से मन में उठा नफरत का भाव विभाव-अनुभाव से तृप्त होकर वीभत्स रस की व्यञ्जना करता है।
रक्त-मांस के सड़े पंक से उमड़ रही है,
महाघोर दुर्गन्ध, रुद्ध हो उठती श्वासा।
तैर रहे गल अस्थि-खण्डशत, रुण्डमुण्डहत,
कुत्सित कृमि संकुल कर्दम में महानाश के॥
यहाँ पर माँस, दुर्गन्ध आदि के कारण उठी नफरत के भाव को वीभत्स रस कहा गया है।
(8) अद्भुत रस (Adbhut ras ki paribhasha)
जब हमें कोई अद्भुत वस्तु, व्यक्ति अथवा कार्य को देखकर आश्चर्य होता है, तब उस रस को अद्भुत रस कहा जाता है।
एक अचम्भा देख्यौ रे भाई। ठाढ़ा सिंह चरावै गाई ॥
जल की मछली तरुबर ब्याई। पकड़ि बिलाई मुरगै खाई।।
यहाँ पर मछली के अद्भुत कार्य की उसे बिल्ली ने पकड़ा और मुर्गे ने खाया के कारण अद्भुत रस उत्पन्न हो रहा है।
(9) शान्त रस(shant ras )
वैराग्य भावना के उत्पन्न होने अथवा संसार से असंतोष होने पर शान्त रस की क्रिया उत्पन्न होती है।
बुद्ध का संसार-त्याग-
क्या भाग रहा हूँ भार देख?
तू मेरी ओर निहार देख-
मैं त्याग चला निस्सार देख।
यहाँ पर बुद्ध के संसार त्यागने से उत्पन्न रस को शांत रस कहा गया है।
(10) वात्सल्य रस (vatsalya ras)
शिशुओं के सौंदर्य उनके क्रिया कलापों आदि को देखकर मन उनकी ओर खींचता है। जिससे मन में स्नेह उत्पन्न होता है, वह वात्सल्य रस कहलाता है।
अधिकतर आचार्यों ने वात्सल्य रस को श्रृंगार रस के अन्तर्गत मान्यता प्रदान की है, परन्तु साहित्य में अब वात्सल्य रस को स्वतन्त्रता प्राप्त हो गयी है।
यसोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावैं दुलरावैं, जोइ-सोई कछु गावैं ।
जसुमति मन अभिलाष करैं।
कब मेरो लाल घुटुरुवन रेंगैं,
कब धरनी पग द्वैक घरै।
यहाँ पर यशोदा के कृष्ण को पालने में झुलाने, उसे देखकर गाना गाने और उससे स्नेह करने को वात्सल्य रस कहा गया है।
(11) भक्ति रस (Bhakti Ras)
जब आराध्य देव के प्रति अथवा भगवान् के प्रति हम अनुराग, रति करने लगते हैं अर्थात् उनके भजन-कीर्तन में लीन हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति में भक्ति रस उत्पन्न होता है। उदाहरण-
जाको हरि दृढ़ करि अंग कर्यो।
सोइ सुसील, पुनीत, वेद विद विद्या-गुननि भर्यो।
उतपति पांडु सुतन की करनी सुनि सतपंथ उर्यो ।
ते त्रैलोक्य पूज्य, पावन जस सुनि-सुन लोक तर्यो।
जो निज धरम बेद बोधित सो करत न कछु बिसर्यो ।
बिनु अवगुन कृकलासकूप मज्जित कर गहि उधर्यो।
इस वाक्य में आपने देव , आराध्य शिव के लिए भक्त की भक्ति को दर्शाया गया है, जो भक्ति रस का कार्य कर रहा है।
रस के अंग (विभाव, अनुभाव, संचारी भाव) (Ras Ke Ang)
रस की उत्पत्ति के लिए तीन अंग जरूरी हैं:
- विभाव – रस उत्पन्न करने का कारण
- आलंबन विभाव (जिसके कारण रस होता है – राम, सीता)
- उद्दीपन विभाव (जो रस को उत्तेजित करता है – फूल, चाँदनी)
- अनुभाव – रस का बाहरी प्रभाव (शारीरिक चिह्न) उदाहरण: रोमांच, अश्रु, स्वेद, कंपन
- संचारी भाव (व्यभिचारी भाव) – आने-जाने वाले भाव उदाहरण: हर्ष, शोक, चिंता, उत्साह (33 संचारी भाव)
रस और भाव में अंतर (Ras aur Bhav Mein Antar)
| बिंदु | रस (Ras) | भाव (Bhav) |
|---|---|---|
| परिभाषा | स्थायी भाव + विभाव-अनुभाव से उत्पन्न आनंद | मन में उत्पन्न होने वाला भाव |
| स्थिरता | स्थिर और पूर्ण अनुभूति | आना-जाना (संचारी भाव) |
| उदाहरण | श्रृंगार रस (पूर्ण प्रेम अनुभूति) | रति (प्रेम भाव) |
| परीक्षा में | रस के प्रकार पूछे जाते हैं | स्थायी भाव पूछे जाते हैं |
रस का महत्व / काव्य में भूमिका (Mahatva / Kavy Mein Bhumika)
- रस काव्य की आत्मा है (मम्मट)
- बिना रस के काव्य सूखा लगता है
- रस से पाठक को आनंद मिलता है
- काव्य को अमर बनाता है
- भावनाओं को गहराई देता है
परीक्षा / क्लास लेवल टिप्स (Class 9-12 & Competitive Exams)
- कक्षा 9-10: रस के 9 प्रकार + स्थायी भाव (4-6 अंक)
- कक्षा 11-12: रस की परिभाषा (भरतमुनि/मम्मट) + विभाव-अनुभाव (8-12 अंक)
- TET/CTET: रस के प्रकार और उदाहरण
- UPSC/NET: रस के सिद्धांत (ध्वनि, रस, अलंकार)
- याद रखें: सबसे महत्वपूर्ण रस – श्रृंगार और शांत
रस का रूप निर्माण (Rup Nirman)
रस का रूप विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से बनता है। स्थायी भाव रस की नींव है, विभाव कारण, अनुभाव प्रभाव और संचारी भाव सहायक होते हैं। यह रूप काव्य को जीवंत और भावपूर्ण बनाता है। कुल मिलाकर, रस काव्य का हृदय है।
विशेषज्ञ राय (Visheshagya Rai)
आचार्यों के अनुसार, “रस के बिना काव्य केवल शब्दों का ढेर है। रस ही काव्य को अमर बनाता है।”
निष्कर्ष (Nishkarsh)
रस काव्यशास्त्र का मूल तत्व है। यह काव्य को आनंदमय और भावपूर्ण बनाता है। कक्षा स्तर पर रस समझना बहुत जरूरी है और प्रतियोगी परीक्षाओं में भी अच्छे अंक दिलाता है। रोजाना एक कविता पढ़ें और उसमें रस पहचानने का अभ्यास करें।
FAQ – वारंवार पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न : रस किसे कहते हैं?
उत्तर: रस वह आनंद है जो विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से काव्य में उत्पन्न होता है।
प्रश्न : रस के कितने प्रकार हैं?
उत्तर: मुख्य रूप से 9 – श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शांत।
प्रश्न : श्रृंगार रस का स्थायी भाव क्या है?
उत्तर: रति (प्रेम)।
प्रश्न : रस के अंग क्या हैं?
उत्तर: विभाव, अनुभाव, संचारी भाव।
प्रश्न : रस की परिभाषा किसने दी?
उत्तर: भरतमुनि – “विभावानुभाव-व्यभिचारी-संयोगाद् रसनिष्पत्तिः”।
प्रश्न : कक्षा 12 में रस से कितने अंक आते हैं?
उत्तर: 8 से 12 अंक (परिभाषा + प्रकार + उदाहरण)।
प्रश्न : परीक्षा में रस कैसे लिखें?
उत्तर: भरतमुनि या मम्मट की परिभाषा लिखें और 2-3 उदाहरण दें।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
यह लेख शैक्षणिक एवं अध्ययन उद्देश्य के लिए तैयार किया गया है। उदाहरण और व्याख्या विद्यार्थियों की सुविधा के अनुसार सरल रखी गई है। काव्यशास्त्र के नियम विभिन्न आचार्यों के अनुसार थोड़े भिन्न हो सकते हैं। हमेशा NCERT/राज्य बोर्ड की अधिकृत किताबों से पुष्टि करें।
Read Also:
मराठी विराम चिन्हे (Marathi Viram Chinh)
Chhand Ki Paribhasha: प्रकार, पहचान, उदाहरण और विशेषताएँ (2026)
Bhugol Ki Paribhasha:भूगोल क्या है?
Samajshastra Ki Paribhasha – समाजशास्त्र क्या है?
