परिचय
कल्पना कीजिए कि आप कोई कविता ज़ोर से पढ़ रहे हैं — शब्द सरल हैं, भाव सुंदर हैं, लेकिन एक खास लय है जो अपने-आप मन को बाँध लेती है।
यही लय केवल तुक से नहीं आती, बल्कि मात्राओं की गणना से जन्म लेती है। हिंदी काव्य में इसी लयात्मक व्यवस्था को हम मात्रिक छंद कहते हैं।
स्कूल के छात्र हों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थी हों, या हिंदी साहित्य के प्रेमी — Matrik Chhand को समझे बिना कविता की आत्मा को समझना अधूरा है।
इस लेख में हम इसे बिल्कुल क्लासरूम-स्टाइल में, उदाहरणों और तालिकाओं के साथ समझेंगे।
Matrik Chhand Ki Paribhasha- मात्रिक छंद की परिभाषा
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| परिभाषा | जिस छंद में वर्णों की गिनती नहीं, बल्कि मात्राओं की गणना के आधार पर पद्य की रचना होती है, उसे Matrik Chhand कहते हैं। |
| आधार | ह्रस्व (1 मात्रा) और दीर्घ (2 मात्रा) |
| प्रयोग | दोहा, चौपाई, सोरठा आदि |
सरल शब्दों में:
जब कविता की लय यह देखकर तय हो कि शब्दों में कितनी मात्राएँ हैं, न कि कितने अक्षर — तो वह Matrik Chhand कहलाती है।
मात्रिक छंद के प्रकार (Matrik Chhand Ke Prakar)
1. सामान्य मात्रिक छंद (Samanya Matrik Chhand)
जिन छंदों में प्रति पद (पंक्ति) 32 मात्राओं तक होती हैं, उन्हें सामान्य मात्रिक छंद कहते हैं।
मुख्य बातें
-
मात्रा की संख्या सीमित होती है
-
लय सरल और सहज होती है
-
विद्यालयी पाठ्यक्रम में अधिक पढ़ाए जाते हैं
उदाहरण
चौपाई, दोहा, रोला, सोरठा आदि
2. दण्डक मात्रिक छंद (Dandak Matrik Chhand)
जिन छंदों में प्रति पद 32 मात्राओं से अधिक होती हैं, वे दण्डक मात्रिक छंद कहलाते हैं।
मुख्य बातें
-
पंक्तियाँ लंबी होती हैं
-
रचना कठिन मानी जाती है
-
शास्त्रीय काव्य में अधिक प्रयोग
उदाहरण
-
झूलना (37 मात्राएँ)
-
हरिप्रिया (46 मात्राएँ)
3. सम मात्रिक छंद (Sam Matrik Chhand)
जिस छंद के सभी चरणों में मात्राओं की संख्या समान होती है, उसे सम मात्रिक छंद कहते हैं।
मुख्य बातें
-
सभी पद समान मात्रा वाले
-
लय पूरी तरह संतुलित
-
पहचान सबसे आसान
उदाहरण
चौपाई (16–16), रोला (24–24), हरिगीतिका (28–28)
4. अर्धसम मात्रिक छंद (Ardhsam Matrik Chhand)
जिस छंद में
-
पहला और तीसरा चरण समान,
-
दूसरा और चौथा चरण समान हों,
लेकिन -
पहला और दूसरा चरण मात्रा में अलग हों,
उसे अर्धसम मात्रिक छंद कहते हैं।
मुख्य बातें
-
आंशिक समानता होती है
-
प्रायः दो दलों में रचना
-
नीति और उपदेशात्मक काव्य में उपयोग
उदाहरण
दोहा (13–11), सोरठा (11–13), बरवै, उल्लाला
5. विषम मात्रिक छंद (Visham Matrik Chhand)
जिन छंदों के पदों में मात्राओं की समानता नहीं होती,
और जो दो या दो से अधिक छंदों के मेल से बनते हैं,
उन्हें विषम मात्रिक छंद कहा जाता है।
मुख्य बातें
-
मात्रा असमान होती है
-
मिश्रित छंद होते हैं
-
पहचान थोड़ी कठिन
उदाहरण
-
कुण्डलिया = दोहा + रोला
-
छप्पय = रोला + उल्लाला
मात्रिक छंद पहचानने के नियम (Matrik Chhand Pehchanne Ke Niyam)
नियम 1: वर्ण नहीं, मात्रा गिनिए
मात्रिक छंद की पहचान का सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण नियम है—
अक्षर (वर्ण) नहीं, बल्कि मात्रा गिनी जाती है।
गलत तरीका:
“इस पंक्ति में कितने अक्षर हैं?”
सही तरीका:
“इस पंक्ति में कुल कितनी मात्राएँ हैं?”
नियम 2: ह्रस्व और दीर्घ स्वरों की पहचान करें
| स्वर | मात्रा |
|---|---|
| अ, इ, उ, ऋ | 1 मात्रा |
| आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ | 2 मात्रा |
उदाहरण:
-
रवि = र (1) + वि (1) = 2 मात्राएँ
-
सीता = सी (2) + ता (2) = 4 मात्राएँ
जब पूरी पंक्ति की मात्रा निश्चित संख्या में पूरी हो जाए, तो वह मात्रिक छंद हो सकता है।
नियम 3: गुरु और लघु का ध्यान रखें
-
लघु (⏑) → 1 मात्रा
-
गुरु (–) → 2 मात्राएँ
अधिकांश Matrik Chhand में लघु-गुरु का संतुलन ही लय बनाता है।
नियम 4: प्रसिद्ध छंदों का मात्रा-पैटर्न याद रखें
कुछ प्रमुख मात्रिक छंदों के मात्रा-पैटर्न याद रखने से पहचान आसान हो जाती है:
| छंद | मात्रा-पैटर्न |
|---|---|
| दोहा | 13 + 11 |
| सोरठा | 11 + 13 |
| चौपाई | 16 + 16 |
| रोला | 24 |
यदि पंक्ति इन पैटर्न से मेल खाती है, तो वह Matrik Chhand है।
नियम 5: यति (ठहराव) का स्थान देखें
मात्रिक छंदों में अक्सर यति (हल्का विराम) निश्चित स्थान पर होती है।
उदाहरण (दोहा):
13 मात्रा | यति | 11 मात्रा
सही स्थान पर यति होना, मात्रिक छंद की मजबूत पहचान है।
नियम 6: लय में पढ़कर जाँच करें
अगर पंक्ति को ज़ोर से पढ़ने पर एक समान लय बने और कहीं अटकाव न आए—
तो समझिए कि वह पंक्ति मात्रिक छंद में है।
नियम 7: तुकांत अनिवार्य नहीं होता
-
मात्रिक छंद की पहचान तुक से नहीं,
-
बल्कि मात्राओं की संख्या से होती है।
कई मात्रिक छंद बिना तुक के भी सही होते हैं।
मात्रिक छंद के 20 उदाहरण (Matrik Chhand Ke 20 Udaharan)
उदाहरण 1
भोलेनाथ करुणा के सागर।
दीनन के दुःख हरने वाले।।
उदाहरण 2
जटा जूट में गंगा धारी।
त्रिनयन रूप अति बलकारी।।
उदाहरण 3
डमरू बाजे हाथ तुम्हारे।
नाद से जागे जग संसारे।।
उदाहरण 4
भस्म रमाए योगी ज्ञानी।
माया तज कर अंतर ध्यानी।।
उदाहरण 5
नीलकंठ शिव नाम महान।
जपते मिटते दुःख अज्ञान।।
उदाहरण 6
काशी धाम तुम्हारा वासा।
भक्त हृदय में तुम ही आशा।।
उदाहरण 7
मस्तक चंद्र सजे अति प्यारे।
करुणा दृष्टि सब पर धारे।।
उदाहरण 8
शिव शंकर जग के अधिपाती।
भवसागर से पार लगाती।।
उदाहरण 9
भक्त पुकारे नाम तुम्हारा।
कटे जनम का फेरा सारा।।
उदाहरण 10
पार्वतीपति त्रैलोक्येश।
तुम बिन कोई न जग का केश।।
उदाहरण 11
हर हर बोले जो नर नारी।
उसकी विपदा जाए सारी।।
उदाहरण 12
कालों के भी तुम हो काल।
लीला तेरी अति विशाल।।
उदाहरण 13
शिव चरणों में शीश नवाओ।
मन वांछित फल सब तुम पाओ।।
उदाहरण 14
साधु संत के तुम आधार।
जग में सत्य तुम्हीं अवतार।।
उदाहरण 15
अमर कथा शिव नाम सुहानी।
सुन कर जागे अंतर ज्ञानी।।
उदाहरण 16
भव भय हारी भोले बाबा।
कृपा करो हे जग के दाता।।
उदाहरण 17
रुद्र रूप में प्रलय दिखाओ।
शिव रूप में सृष्टि बसाओ।।
उदाहरण 18
शिव की भक्ति अमृत धारा।
पी ले जो हो भाग्य तुम्हारा।।
उदाहरण 19
ज्ञान दीप से तम हर जाओ।
भोले बाबा कृपा दिखाओ।।
उदाहरण 20
जीवन सफल शिव नाम ध्याना।
चौपाई छंद यही पहचाना।।
मात्रिक छंद का रूप निर्माण (Matrik Chhand Ka Rup Nirman)
1. मात्रा क्या होती है? (आधार समझिए)
मात्रिक छंद का पूरा ढांचा मात्रा पर टिका होता है।
स्वरों की मात्रा
| स्वर | मात्रा |
|---|---|
| अ, इ, उ, ऋ | 1 मात्रा |
| आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ | 2 मात्रा |
| अनुस्वार (ं), विसर्ग (ः) | मात्रा बढ़ाते हैं |
उदाहरण
-
मन → म(1) + न(1) = 2 मात्रा
-
राम → रा(2) + म(1) = 3 मात्रा
2. लघु और गुरु से रूप बनता है
-
लघु = 1 मात्रा
-
गुरु = 2 मात्राएँ
इन्हीं लघु-गुरु के क्रम से मात्रिक छंद का रूप तैयार होता है।
3. पहले छंद का प्रकार तय किया जाता है
रूप निर्माण का पहला कदम है—
कौन-सा Matrik Chhand लिखना है?
| छंद | प्रति चरण मात्रा |
|---|---|
| दोहा | 13 / 11 |
| सोरठा | 11 / 13 |
| चौपाई | 16 / 16 |
| रोला | 24 |
उदाहरण:
यदि चौपाई लिखनी है, तो हर चरण में 16 मात्रा अनिवार्य होगी।
4. शब्दों का चयन मात्रा देखकर किया जाता है
यहाँ शब्द अर्थ से पहले मात्रा देखकर चुने जाते हैं।
उदाहरण (16 मात्रा का ढांचा)
भो (2) + ले (2) + ना (2) + थ (1)
= 7 मात्राएँ
अब आगे ऐसे शब्द जोड़ते हैं कि कुल 16 पूरी हों।
इसी प्रक्रिया से पंक्ति का रूप बनता है।
5. संज्ञा, विशेषण और क्रिया से रूप निर्माण
मात्रिक छंद में शब्द तीनों वर्गों से लिए जाते हैं, पर मात्रा संतुलन ज़रूरी है।
| शब्द वर्ग | उदाहरण | मात्रा |
|---|---|---|
| संज्ञा | शिव | 2 |
| विशेषण | करुणामय | 4 |
| क्रिया | हरते हैं | 4 |
शब्द बदले जा सकते हैं, पर मात्रा नहीं बिगड़नी चाहिए।
6. यति (ठहराव) से रूप स्पष्ट होता है
मात्रिक छंद में अक्सर बीच में यति होती है।
चौपाई में:
8 मात्रा | यति | 8 मात्रा
इससे छंद का रूप संतुलित और मधुर बनता है।
7. तुकांत से सौंदर्य बढ़ता है
-
अंत में समान ध्वनि जोड़ने से छंद सुंदर बनता है
-
पर मात्रिक छंद का रूप तुक से नहीं, मात्रा से बनता है
8. पूरा उदाहरण (रूप निर्माण करके दिखाया गया)
छंद प्रकार: चौपाई (16 मात्रा)
भो (2) ले (2) ना (2) थ (1)
क (1) रु (1) णा (2) के (2)
सा (2) गर (1)
कुल = 16 मात्राएँ
इसलिए यह मात्रिक छंद का सही रूप है।
9. याद रखने की ट्रिक
“पहले मात्रा, फिर शब्द, तब भाव”
अगर
✔ मात्रा पूरी
✔ लय बनी
✔ अर्थ स्पष्ट
वही सही मात्रिक छंद का रूप निर्माण है।
मात्रिक छंद और वर्णिक छंद में अंतर
| क्रम | आधार | मात्रिक छंद | वर्णिक छंद |
|---|---|---|---|
| 1 | परिभाषा | जिस छंद में मात्राओं की गिनती से पद्य रचना होती है | जिस छंद में वर्णों (अक्षरों) की गिनती से पद्य रचना होती है |
| 2 | गणना का आधार | ह्रस्व–दीर्घ स्वरों की मात्रा | अक्षरों की निश्चित संख्या |
| 3 | लघु-गुरु | लघु (1) और गुरु (2) का महत्व | लघु-गुरु का महत्व नहीं |
| 4 | लय | स्वाभाविक और लचीली | अपेक्षाकृत कठोर |
| 5 | यति (ठहराव) | प्रायः निश्चित स्थान पर | कभी निश्चित, कभी नहीं |
| 6 | तुकांत | अनिवार्य नहीं | कई छंदों में अनिवार्य |
| 7 | रचना की कठिनाई | अपेक्षाकृत सरल | अपेक्षाकृत कठिन |
| 8 | प्रयोग | भक्ति, नीति, लोककाव्य | संस्कृतनिष्ठ, शास्त्रीय काव्य |
| 9 | प्रमुख छंद | दोहा, चौपाई, सोरठा | अनुष्टुप, शार्दूलविक्रीडित |
| 10 | उदाहरण | “सिय राम मय सब जग जानी” | “वनं गच्छति रामः” |
| 11 | छात्र-अनुकूलता | छात्रों के लिए आसान | छात्रों के लिए कठिन |
| 12 | परीक्षा में पहचान | मात्रा गिनकर | वर्ण गिनकर |
| 13 | भाव अभिव्यक्ति | सहज और भावपूर्ण | नियमबद्ध और गंभीर |
| 14 | भाषा शैली | सरल, जनभाषा | संस्कृत प्रधान |
| 15 | उद्देश्य | लय और भाव सौंदर्य | शास्त्रीय अनुशासन |
विशेषज्ञ राय
छात्र तब ही छंद को सही रूप में समझ पाते हैं, जब उन्हें मात्रिक छंद और वर्णिक छंद के मूल अंतर स्पष्ट हो जाते हैं। मात्रिक छंद में मात्रा-गणना से लय अपने-आप बन जाती है, जबकि वर्णिक छंद में वर्णों की निश्चित संख्या काव्य को अनुशासन देती है। परीक्षा और व्यवहारिक दोनों दृष्टि से विद्यार्थियों के लिए पहले मात्रिक छंद को समझना अधिक उपयोगी और सहज होता है।”
निष्कर्ष
Matrik Chhand (मात्रिक छंद) केवल परीक्षा का विषय नहीं, बल्कि कविता की धड़कन है।
जब आप मात्रा को समझ लेते हैं, तब कविता बोझ नहीं — आनंद बन जाती है।
आज सीखा हुआ ज्ञान, कल आपकी भाषा को और समृद्ध करेगा।
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Matrik Chhand से जुड़े प्रश्न-उत्तर
Q1. मात्रिक छंद क्या है?
उत्तर: मात्रा की गणना पर आधारित छंद को मात्रिक छंद कहते हैं।
Q2. क्या दोहा मात्रिक छंद है?
उत्तर: हाँ, दोहा 13-11 मात्रा वाला Matrik Chhand है।
Q3. मात्रिक छंद और वर्णिक छंद में मुख्य अंतर?
उत्तर: एक मात्रा पर, दूसरा वर्ण पर आधारित होता है।
Q4. Matrik Chhand कहाँ उपयोग होता है?
उत्तर: भक्ति, नीति और लोक काव्य में।
Q5. परीक्षा में इसे कैसे याद रखें?
उत्तर: मात्रा-पैटर्न और तालिका से अभ्यास करें।
डिस्क्लेमर
यह लेख शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी विभिन्न मान्य हिंदी व्याकरण ग्रंथों और विद्यालयी पाठ्यक्रमों पर आधारित है।
