परिचय
कभी-कभी कविता पढ़ते हुए हमें एक ऐसी कविता मिलती है, जो अपनी लय, तुक और दोहराव से मन में घंटियों-सी ध्वनि भर देती है। जैसे ही पहला पद समाप्त होता है और वही शब्द फिर से चक्र की तरह आरंभ में लौट आता है, पाठक इस छंद की मधुरता में खो जाता है। यही अनुभूति Kundaliya Chhand की विशेषता है — एक ऐसा छंद जो शब्दों को “कुंडल” (चक्र) की तरह घुमाता है और भावों को एक सुंदर लय में बाँध देता है।
यदि आप विद्यार्थी हैं, शिक्षक हैं या हिंदी साहित्य में रुचि रखते हैं, यह लेख आपको Kundaliya Chhand को गहराई से, पर सरल भाषा में समझने में मदद करेगा — बिल्कुल 2025 के आधुनिक संदर्भ के साथ।
Kundaliya Chhand Ki Paribhasha-
Kundaliya Chhand एक ऐसा बंद (कविता का रूप) है जिसमें दोहा और रोला — दोनों का संयोजन होता है। इसकी विशेषता यह है कि पहली पंक्ति के पहले और अंतिम शब्द अगले रोले की पहली पंक्ति में ठीक उसी क्रम में फिर दोहराए जाते हैं। यह पुनरावृत्ति छंद को “कुंडल” (लूप) के आकार जैसी संरचना देती है।
परिभाषा सार-तालिका
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| छंद का नाम | Kundaliya Chhand |
| संरचना | दोहा + रोला |
| मुख्य विशेषता | पहले पद के प्रारंभ और अंत के शब्द अगले पद का आरंभ बनते हैं |
| लय | 24 + 24 (दोहा), 16 + 12 (रोला) |
| उपयोग | भक्ति, नीति, व्यंग्य, हास्य, शिक्षाप्रद कविता |
कुंडलियां छंद के प्रकार (Kundaliya Chhand Ke Prakar)
साहित्य में आमतौर पर इसके दो प्रमुख प्रकार माने जाते हैं:
| प्रकार | विवरण |
|---|---|
| शुद्ध कुंडलिया | दोहा + रोला के नियमों का पूर्ण पालन, शब्दों की शुद्ध पुनरावृत्ति |
| लघु कुंडलिया / मुक्त कुंडलिया | संरचना समान, लेकिन शब्दों और भावों में स्वतंत्रता अधिक |
कुंडलियां छंद को पहचानने के नियम (Kundaliya Chhand Pehchanne Ke Niyam)
1. दोहा + रोला का संयोजन होना अनिवार्य है
कुंडलिया छंद 2 भागों से मिलकर बनता है—
-
पहला भाग: दोहा
-
दूसरा भाग: रोला
-
यदि कोई कविता सिर्फ दोहा है या सिर्फ रोला है — तो वह कुंडलिया नहीं है।
कुंडलिया हमेशा दोहा + रोला का मेल होता है।
2. दोहे की पहली पंक्ति के पहले और अंतिम शब्द रोला में दोहराए जाते हैं
यह सबसे महत्वपूर्ण नियम है।
✔ दोहे की पहली पंक्ति का पहला शब्द
✔ और दोहे की पहली पंक्ति का अंतिम शब्द
ठीक-ठीक उसी क्रम में रोला की पहली पंक्ति की शुरुआत में आते हैं।
इसे “कुंडल” या “लूप” बनाने वाला नियम कहा जाता है।
उदाहरण (सिर्फ समझने के लिए):
दोहा की पहली पंक्ति:
➡ “ज्ञान अमृत सब बाँटिए…”
यहाँ पहला शब्द = ज्ञान, अंतिम शब्द = बाँटिए
रोला की शुरुआत होगी —
➡ “ज्ञान… बाँटिए… से जग उजियारा…”
यही दोहराव कुंडलिया की पहचान है।
3. दोहा छंद के मात्रिक नियम पूरे हों
दोहा की चार पंक्तियाँ होती हैं (दोहे में दो चरण × 2 पंक्तियाँ):
-
13 + 11
-
13 + 11
मात्रा गणना पूरी होनी चाहिए।
(गहराई वाले नियम कविता रचने में ज़रूरी हैं, पहचानने में इतना संकेत काफ़ी है।)
4. रोला छंद के मात्रिक नियम पूरे हों
रोला की दो पंक्तियाँ होती हैं:
-
16 + 12
-
16 + 12
यदि दोहा और रोला दोनों छंद संरचना पूरी कर रहे हों → यह कुंडलिया होने की दिशा में संकेत है।
5. कविता का भाव-विस्तार संरचनात्मक होता है
कुंडलिया में:
-
दोहा विषय की शुरुआत करता है
-
रोला उसी विषय को विस्तार देता है
-
और शब्द पुनरावृत्ति कविता में प्रवाह बनाती है
कविता में यह “वृत्ताकार भावना” रहेगी तो Kundaliya Chhand होता है।
6. पुनरावृत्ति का स्वरूप साफ़ दिखाई देता है
कुंडलिया छंद पढ़ते समय ऐसा लगता है कि कविता “घूमकर फिर से वहीं लौट आई”।
वही शब्द — वही शुरुआत — वही प्रवाह।
यह पुनरावृत्ति कुंडल जैसा प्रभाव बनाती है।
इसी लिए इसे Kundaliya Chhand कहा जाता है।
कुंडलियां छंद के 20 उदाहरण (Kundaliya Chhand 20 Udaharan)
उदाहरण–1
सत्कर्मों की जोत को, मन में रखो जलाय।
अंधियारा हट जाइगा, पावै जग उजियाय।।
पावै जग उजियाय, करै जो सेवा प्यारी।
मन होवे निष्कलंक, मिटै भीतर की खारी।।
कह कविजन मृदुभाव, पथ यही शुभ का माना।
जागो रे मानव आज, सत्कर्म रंग न जाना।।
उदाहरण–2
रत्न वही कहलाय है, जो परखै परखहार।
काठ-पत्थरों में नहीं, मिलता ऐसा सार।।
मिलता ऐसा सार, वही टिकता जग भीतर।
ज्योँ चंदन की सुगंध, बसे जन-जन के अंतर।।
कह कवि मनुज विवेक, रखो मन में यह सच्चा।
परखो हर एक जनम, तब ही पाओ अच्छा।।
उदाहरण–3
मीठी वाणी बोलिए, खुश होवे सब लोग।
कटु वचन कसकाय के, कर दे अंतर रोग।।
कर दे अंतर रोग, न बोले जो मीठा है।
कठोरता की नाद, सदा जग में चीठा है।।
कह ‘सुधाकर’ ज्ञानी, यही नीति अपनाओ।
मीठी भाषा बोल, सभी जग अपना बनाओ।।
उदाहरण–4
सत्संगति के संग में, मिलता निर्मल तेज।
दुष्ट संग सब नष्ट हो, बुझता जीवन मेज।।
बुझता जीवन मेज, पर अंकुर फिर भी फूटे।
सद्गुण की बूंदें, हर मन को जाएँ छूटे।।
कह ‘गिरिधर’ कविराय, यही जीवन का नाता।
सत्संग संग चलो, यही उज्ज्वल है पथ जाता।।
उदाहरण–5
शिक्षा ही इंसान को, देती ऊँची उड़ान।
अज्ञानँध का हटत ही, खुलता मन का ग्यान।।
खुलता मन का ग्यान, जगत में मान बढ़ावे।
पढि–लिखि होवे धीर, सदा संयम अपनावे।।
कह कवि सत्य प्रबोध, यही जीवन की दिशा है।
शिक्षा से ही मनुज, पावै ऊँची आशा है।।
उदाहरण–6
सेवा कर मानव की, होते भगवान पास।
भाव बिना जो कर्म है, वह तो जग में नाश।।
वह तो जग में नाश, प्रेम से जो पथ चालै।
सुख–शांति का देश, उसी का जीवन पालै।।
कह कवि कीरतन भाव, यही सेतु की रेखा।
सेवा कर सच्चे मन, मिटे मन का सखा।।
उदाहरण–7
परहित में जो लीन है, वह मानव गुणवान।
अपने सुख पर ध्यान दे, वह तो केवल अजान।।
वह तो केवल अजान, मत कर तू ऐसा व्यवहार।
परहित का फल मीठ, जगत में सबसे साचार।।
कह ‘नारायण’ सरल, यही जीवन की दूरी है।
परहित मानव धर्म, यही जीवन की पूरी है।।
उदाहरण–8
हाथों में कर्म लगै, मन में हो विश्वास।
जो डरके रुक जात हैं, खोवैं सब उपहास।।
खोवैं सब उपहास, वही पाए जो आगे।
साहस की लकीर, लिखै जीवन के भागे।।
कह कवि उन्नति–मार्ग, कठिन ही सही पर प्यारा।
कर्म करो निर्भय हो, यही संकट उद्धारा।।
उदाहरण–9
लोभ मोह की डोर को, काटो मन से आज।
बंधन ढीले हो जावगे, खुल जावै सिर–ताज।।
खुल जावै सिर–ताज, मनुज आगे बढ़ जावे।
अवरोधों के पार, वह हर मंज़िल को पावै।।
कह कवि ‘गरिमा’ सत्य, यही जीवन का फेरा।
लोभ छोड़ मनुज, यही धर्म का बसेरा।।
उदाहरण–10
माता-पिता से बड़ा, दुनिया में क्या दान।
तन-मन-धन सब वारि के, करते पालन–पान।।
करते पालन–पान, सदा वरदायी छाया।
सुख–दुख में साथ, न तजैं मन को माया।।
कह ‘गोविंद’ कविराय, सदा मानो उपकारी।
माता–पिता का मान, जगत में सर्वोत्तरी।।
उदाहरण–11
धरती माता दान दे, अग-जल-वन-उपचार।
इसके वर को भूलना, मनुज न कर व्यापार।।
मनुज न कर व्यापार, यही जीवन का मूल है।
प्रकृति–रूप की छाँव, सदा देती शीतल फूल है।।
कह कवि हरित–संदेश, रखो धरती की रक्षा।
धरती माता पूज्य, यही मानव की आकांक्षा।।
उदाहरण–12
संगति अच्छी रखिए, मन होवे पवित्र।
दुष्ट संग से खोय के, मन हो जावे चित्र।।
मन हो जावे चित्र, भटक जावे पथ आगे।
अंधियारे में गिरै, न पावै सही सुहागे।।
कह कवि दीप विचार, सत्संगति ही रंगती।
अच्छे जन का साथ, जीवन नौका तरती।।
उदाहरण–13
मन का स्वामी आप है, बंधन खुद ही तोड़।
सोया भाग्य जगाइये, कर्मों की दे चोट।।
कर्मों की दे चोट, फिर आगे राह बनावे।
नव–संकल्पों से, हर संकट भी मुसकावे।।
कह कवि चरित–प्रकाश, यही मानव का मोल है।
मनुज स्वयं निर्माता, यही जीवन का गोल है।।
उदाहरण–14
सत्य अहिंसा धर्म है, यही महापुरुष बोल।
वीर वही कहलाय जो, मन के जीते खोल।।
मन के जीते खोल, वही जीवन का राजा।
द्वेष-दहन मिटाय, वही निर्मल है साजा।।
कह ‘रामेश’ विचार, यही सच्चे जन का कर्म है।
सत्य-अहिंसा मार्ग, जगत में उत्तम धर्म है।।
उदाहरण–15
ईर्ष्या छोड़ो मनुज, नहिं इसका कोई लाभ।
दूसर सुख पर जलन से, खोवै मन का थाब।।
खोवै मन का थाब, दुखों का घर बस जावे।
द्वेष-जलन की आग, सदा मन को जलावे।।
कह कवि सुधा-प्रसंग, यही नीति का रेशा।
ईर्ष्या का परिहार, बनावे जीवन लेखा।।
उदाहरण–16
संयम जीवन शास्त्र है, मन को रखो थाम।
क्रोध-द्वेष से दूर रह, बढ़त बनी परधाम।।
बढ़त बनी परधाम, वही जग में सुख पावे।
मधुर वचन के रंग, सभी मन में बस जावे।।
कह कवि सरल विचार, यही धर्म का गहना।
संयम का उपहार, न कहीं मिलता बहना।।
उदाहरण–17
प्रेम अमृत बरसै सदा, जहाँ रहे सद्भाव।
घृणा जरा सी आ गई, टूटे मन का छाव।।
टूटे मन का छाव, न फल पाए जग में कोई।
कठोरता की राह, कभी अपना न होई।।
कह ‘मधुकर’ कविराज, प्रेम से जीवन चमका।
प्रेम अमृत का रंग, जगत में सबसे दमका।।
उदाहरण–18
साधन से ही सिद्धि है, कर्म करे इंसान।
आलस में जो खोईये, मिलता नहीं सम्मान।।
मिलता नहीं सम्मान, समय का मान रखै जो।
प्रयत्न करे दिन–रैन, वही जीवन में हो सो।।
कह ‘गिरिधर’ कविराय, यही रणनीति मत साधन।
कर्म करो निर्भय हो, तभी मिलत है साधन।।
उदाहरण–19
सच्ची बात कहे वही, होवे जन में शूर।
झूठे वचन पतंग से, जलते नित भरपूर।।
जलते नित भरपूर, झूठ लेकर जो चलत हैं।
विश्वासों के बीच, कभी टिकि नहीं फलत हैं।।
कह कवि सत्य-विवेक, यही जीवन का नाता।
सच से बढ़के आज, नहीं कोई उपचाता।।
उदाहरण–20
जो जन करुणा बाँटते, वही परम गुणवान।
कठोरता की राह पर, मिलता सिर्फ क्लेश-विधान।।
मिलता सिर्फ क्लेश-विधान, मनुज को यह समझाओ।
दया-धर्म अपनाय, जगत में सुख ही पाओ।।
कह ‘शशिकांत’ विचार, करुणा सबसे उत्तम।
करुणा से मानव–जीवन, हो जाता है पवित्रतम।।
कुंडलियां छंद का रूप निर्माण (Kundaliya ChhandKa Rup Nirman)
1. संज्ञा आधारित निर्माण
-
दोहे की पहली पंक्ति की शुरुआत एक स्पष्ट संज्ञा से होती है।
-
वही संज्ञा रोला की शुरुआत में दोहराई जाती है।
उदाहरण:
“ज्ञान अमृत” → “ज्ञान अमृत से…”
2. विशेषण आधारित निर्माण
विशेषण+संज्ञा का प्रयोग लय बनाता है।
उदाहरण:
“पावन मन” → “पावन मन को…”
3. क्रिया आधारित निर्माण
क्रिया के अंत में आने वाले शब्द रोले में आसानी से फिट हो जाते हैं।
उदाहरण:
“जीवन संवारो” → “जीवन संवारो तो…”
4. दोहा लिखने के बाद रोला जोड़ना
-
पहले दोहे की लय तय करें।
-
फिर उन्हीं प्रथम और अंतिम शब्दों के साथ रोला की शुरुआत करें।
-
रोला में भाव को विस्तारित करें।
विशेषज्ञ राय
Kundaliya Chhand हिंदी काव्य का सबसे जीवंत और प्रभावशाली छंद है।
यह न केवल काव्यशास्त्र की दृष्टि से रोचक है, बल्कि विद्यार्थियों को लय, भाव और संरचना की समझ विकसित करने में भी अत्यंत सहायक है।
2025 के डिजिटल दौर में भी यह छंद सोशल मीडिया कविता एवं शिक्षण सामग्री में खूब उपयोग किया जा रहा है।
निष्कर्ष
Kundaliya Chhand (कुंडलियां छंद) शब्दों को कुंडल की तरह जोड़कर भावों का एक सुंदर वृत्त बनाता है। यह छंद सरल होते हुए भी गहरा संदेश देता है। यदि आप कविता लिखना सीख रहे हैं, तो कुंडलिया से शुरुआत करना एक उत्कृष्ट विकल्प है। अभ्यास करते रहें, नए शब्दों से खेलें और अपनी रचनात्मकता को उड़ान दें — यही कला आपको एक बेहतर कवि बनाएगी।
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FAQs (5 प्रश्न-उत्तर)
1. Kundaliya Chhand क्या है?
कुंडलियां छंद एक परंपरागत हिंदी छंद है, जिसमें दो चरण होते हैं—पहला दोहा और दूसरा चौपाई। इसकी पहली पंक्ति का आरंभ और अंत एक ही शब्द/समूह से होता है।
2. कुंडलियां छंद का मुख्य नियम क्या है?
इस छंद में पहले चरण (दोहा) की पहली पंक्ति का आखिरी शब्द, उसी चरण की दूसरी पंक्ति के पहले शब्द के रूप में दोहराया जाता है।
3. कुंडलियां छंद में कितने चरण होते हैं?
कुल छह पंक्तियाँ होती हैं—पहले दो पंक्तियाँ दोहा और अगली चार पंक्तियाँ चौपाई स्वरूप में लिखी जाती हैं।
4. क्या कुंडलियां छंद में तुकांत होना ज़रूरी है?
हाँ, विशेषकर दोहे वाले भाग में तुकांत आवश्यक माना जाता है, जिससे लय सुंदर बनती है।
5. कुंडलियां छंद (दोहराव वाला शब्द) क्या होता है?
वही शब्द या समूह जो दोहा की पहली लाइन के अंत और दूसरी लाइन की शुरुआत में दोहराया जाता है।
6. कुंडलियां छंद और दोहा में क्या अंतर है?
कुंडलिया छंद का पहला हिस्सा दोहा होता है, लेकिन कुंडलिया में शब्द–दोहराव और चौपाई का अनिवार्य मेल उसे साधारण दोहे से अलग करता है।
7. Kundaliya Chhand का छंद-विधान क्या है?
-
दोहा भाग: 13-11 / 13-11 मात्राएँ
-
चौपाई भाग: 16-16-16-16 मात्राएँ
8. क्या कुंडलियां हास्य, भक्ति या किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है?
हाँ, कुंडलिया छंद किसी भी विषय—भक्ति, सामाजिक, हास्य, शिक्षा—पर लिखा जा सकता है।
9. Kundaliya Chhand सीखने के लिए पहला अभ्यास क्या होना चाहिए?
पहले दोहा के नियम सीखें, फिर शब्द-दोहराव की प्रैक्टिस करें। इसके बाद चौपाई को लयबद्ध तरीके से जोड़ना सीखें।
डिस्क्लेमर
यह लेख केवल शैक्षणिक और जानकारीपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। काव्य उदाहरणों का उद्देश्य समझाना है, न कि किसी साहित्यिक रचना का दावा करना।
