परिचय
कभी आप कोई ऐसा दोहा या छंद पढ़ते हैं जिसमें लय, भाव और ताल इतनी सुंदरता से मिलते हों कि पढ़ते ही मन खुश हो जाए? हिंदी काव्य में कई तरह के छंद हैं, लेकिन कुछ छंद ऐसे होते हैं जो गायन, भक्ति और स्थिर लय के कारण विशेष पहचान रखते हैं।
उन्हीं में से एक है— Harigitika Chhand।
कई छात्रों को यह छंद कठिन लग सकता है, पर वास्तव में यह एक बहुत सरल और गीतात्मक छंद है। आज का यह लेख इसे समझना बेहद आसान बना देगा। यहाँ हम इसके अर्थ, नियम, वर्गीकरण, उदाहरण, रूप निर्माण, और 2025 तक की आधुनिक व्याख्या को आसान भाषा में सीखेंगे।
Harigitika Chhand Ki Paribhasha
| विषय | विवरण |
|---|---|
| नाम | Harigitika Chhand |
| किस प्रकार का छंद | वर्णिक छंद (वर्ण-गणों पर आधारित) |
| विशेषता | प्रत्येक चरण में निश्चित मात्रा, मधुर लय और भक्ति/गीतात्मकता |
| मूल पहचान | इसमें 28-28 मात्राओं के चार चरण होते हैं |
परिभाषा (सरल शब्दों में):
Harigitika Chhand वह वर्णिक छंद है जिसमें चार चरण (पंक्तियाँ) होते हैं और हर चरण में 28 मात्राएँ अनिवार्य रूप से प्रयोग की जाती हैं। इसका भाव आमतौर पर गानधर्मी, भक्तिमय और कोमल लय वाला होता है।
हरिगीतिका छंद के प्रकार (Harigitika Chhand Ke Prakar)
| प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| 1. सामान्य हरिगीति छंद | 28 मात्राएँ, स्थिर लय, सरल प्रयोग |
| 2. भक्ति-प्रधान हरिगीति | भक्ति कविताओं में प्रयुक्त लय |
| 3. गीतात्मक हरिगीति | गायन शैली के अनुकूल, कोमल ताल |
| 4. आधुनिक हरिगीति (2025) | आधुनिक कविता में सरल लय के साथ प्रयोग |
हरिगीतिका छंद पहचानने के नियम (Harigitika Chhand Pehchanne Ke Niyam)
1. कुल चार चरण
Harigitika Chhand में हमेशा 4 चरण (चार पंक्तियाँ) होते हैं।
अगर कोई कविता 4 बराबर लय वाली पंक्तियों में बँटी है, तो वह हरिगीति हो सकती है।
2. हर चरण में 28 मात्राएँ
यह इसका सबसे ज़रूरी नियम है:
✔ हर पंक्ति में सटीक 28 मात्राएँ होनी चाहिए।
कैसे पहचानें?
-
छोटी मात्रा (ह्रस्व) = 1
-
बड़ी मात्रा (दीर्घ) = 2
आप पंक्ति की प्रत्येक मात्रा गिनें → यदि 28 आती है = यही Harigitika Chhand है।
3. लय हमेशा मधुर होती है
हरिगीति का स्वर गीत जैसा, कोमल और सरल होता है।
इसे पढ़ते ही एक गान-धर्मी ताल महसूस होती है।
मतलब:
-
अचानक ठहराव नहीं
-
पंक्ति में गति सुचारू
-
पढ़ने में भक्ति/कोमलता का आभास
4. गण-आधारित स्थिरता
इस छंद की लय में अचानक परिवर्तन नहीं होता।
चारों चरण लगभग एक जैसी धुन देते हैं।
यही कारण है कि यह गायन और भक्ति रचनाओं में खूब मिलता है।
5. याद रखने का आसान ट्रिक
छात्र इसे ऐसे याद रखें:
4 चरण × 28 मात्रा = हरिगीतिका छंद
मतलब कुल 112 मात्राओं का पूरा छंद।
6. पंक्ति की शुरुआत और अंत सरल रहते हैं
हरिगीति में पंक्तियाँ बहुत भारी शब्दों से शुरू या समाप्त नहीं होतीं।
इनका लक्ष्य होता है—
कोमलता
प्रवाह
एक समान ताल
हरिगीतिका छंद के 20 उदाहरण (Harigitika Chhand Ke 20 Udaharan)
उदाहरण–1
नभ में नभोमंडल चमका जब, दीप्त हुआ संसार है।
शशि की शीतल दृष्टि पड़ी तो, जल में मधुर उभार है।
फूलों की गंध समीर संग, करती जग का श्रृंगार है।
प्रकृति स्वरूपा माँ धरती का, बढता अनुपम प्यार है।
उदाहरण–2
दीप शिखा सी स्वर्ण धरा पर, बिखरी सुरभित राग है।
मन वन में मोर नृत्य करते, छाया आनंद-वाग है।
नील गगन में उड़ते हंसों, का निर्मल परचाग है।
सज कर ऋतुएँ सब कहतीं—अब, स्वागत का अनुराग है।
उदाहरण–3
बच्चों की खिड़की में सपनों, की राजकथा आकार।
पंख लगाकर मन उड़ जाता, नभ में छूता संसार।
मासूमियत की धूप भरे जो, देती जग को प्यार।
उनकी हँसी स्वयं प्रभु का, प्यारा मीठा उपहार।
उदाहरण–4
बरगद की छाया में बैठा, ऋषि ज्ञान सुनाते थे।
शिष्य विनम्र मन से समस्त, शास्त्रों को अपनाते थे।
धर्म–मर्यादा जीवन–गति की, राह सभी बतलाते थे।
भारत की इस गुरु–परंपरा को, विश्व नमन कर जाते थे।
उदाहरण–5
सागर लहरों की उछलन में, जीवन का संदेश छिपा।
आना–जाना ज्यों तरंगों का, कर्म पथों का लेख झपका।
धारा जब शांत हुई तो मन, शांत लहर–सा ही टिकता।
अंतर्मन में सत्य बहा जो, वह जीवन का मूल दिखा।
उदाहरण–6
श्यामल अँखियाँ जब मुस्कातीं, मन मोहित हो जाता है।
नर्तन करता हृदय रसों में, सुध-बुध सब खो जाता है।
पीताम्बर की छवि मनोहर, जीवन को धन्य बनाती है।
हरि–भक्ति की धारा फिर से, अंतर में उमड़–उमड़ आती है।
उदाहरण–7
रात्रि के गहन तमस में भी जब, दीप प्रबल जल जाता।
एक किरण आशा की बनकर, मन को दृढ़ कर जाता।
संघर्षों से लड़ने वाला, सत्य पथ पर बढ़ जाता।
जीवन की हर कठिन घाटी, आत्मबल से कट जाता।
उदाहरण–8
अम्बर पर छाई गौरव ज्योति, उजियारा आकाश है।
धरती के कण–कण में बसता, जीवन का विश्वास है।
नदियाँ गातीं गीत पवन संग, मन में मधुमास है।
जग के हर प्राणी में छिपा, ईश्वर का उल्लास है।
उदाहरण–9
शिशु मुख पर मुस्कान खिले जब, लगता सत्य सुहावना।
माँ का कोमल स्पर्श बने फिर, वरद पुरुष का गान बना।
बिन बोले भी प्रेम धरा पर, होता है प्रभावना।
जीवन की हर साँस बने जब, मधुमय शुभ अभावना।
उदाहरण–10
रणभूमि में जो दृढ़ खड़ा हो, वीर वही पहचाना है।
धर्म बचाने हेतु लड़े जो, उसका जीवन व्रत माना है।
कठिन मार्ग में हार न माने, वही सच्चा दीवाना है।
मातृभूमि के चरणों में चढ़, जीवन सफल पुराना है।
उदाहरण–11
नदियों का कलकल नाद सुनो, जैसे मन को शीतलता।
वन में झरने गाते रहते, मधु का सुमधुर रागमता।
पर्वत का गंभीर निनाद, देता अद्भुत गाम्भीर्यत्ता।
प्रकृति जगत कनक स्वप्नों का, खोल रही मधु-आवृत्ता।
उदाहरण–12
राधा का मन श्याम सखा पर, जैसे मोर पंख झुका।
श्याम छवि देख अधर तरसते, मुरली का अनुपम सुखा।
विरह बाण से मन घायल हो, प्रेम सिन्धु पुनः उठा।
रसिक शिरोमणि श्याम चरण को, मन ने शत–शत नम्र झुका।
उदाहरण–13
सज धज कर जब वसंत आया, फूले उपवन के द्वार।
मधुबन में कोयल के कंठ से, छिड़ा मधुर मनुहार।
पीत दुपट्टा धारण कर के, खेले पवन अपार।
फूलों की बरखा से सारा, जग बन जाता प्यार।
उदाहरण–14
गुरु चरणों की धूलि सदा ही, ज्यों जीवन का ज्ञान बनी।
उनकी वाणी सत्य प्रकाशित, अंधकार की तान घनी।
शिष्य पथिक बन जग में चलता, साधन–सत्य महान जनी।
जो गुरु–मार्ग पकड़ सके वह, हो जाता अमर कथा––धनी।
उदाहरण–15
जननी के आंचल से पावन, कोई स्थान नहीं होता।
बिन उसके जीवन में प्राणी, सुख–निर्माण नहीं होता।
ममता की धारा बरसे तो, कोई क्लांत नहीं होता।
माँ की गोदी में सिर रखकर, मन विषादमय नहीं होता।
उदाहरण–16
जब भी सूने मन में जगकर, प्रेम तरंगें छा जातीं।
अंतर की पीड़ा कोमल बन, निर्मल सुर में गा जातीं।
धड़कन–धड़कन सत्य सुगंधित, दुनिया को महका जातीं।
मन के गुप्त कक्ष में बैठी, आशाएँ स्वर ला जातीं।
उदाहरण–17
वीणा की तानों में छिपकर, संस्कृति मुस्काती है।
भारत माता के आँचल में, विरासत लहराती है।
युग–युग से यह धरती अपनी, अमृतधारा गाती है।
धर्म–धरा पर जीवन–मूल्य, जग को पथ दिखलाती है।
उदाहरण–18
स्वाधीनता का दीप प्रज्वलित, करता नव संकल्प यहाँ।
वीरों ने रक्त बहाया था, जग में स्वतंत्र–कल्प यहाँ।
उनकी स्मृति जगा कर रखती, मातृभूमि का दर्प यहाँ।
भारत का यह नव इतिहास, देता गौरव–कल्प यहाँ।
उदाहरण–19
मेघों की गड़गड़ाहट सुनकर, धरती झूम झूम जाती।
बरखा की बूँदें धीरे–धीरे, जल का वरदान बरसातीं।
किसान हृदय उल्लास में भर, खेती में लग जाता।
जल से उपजा शुभ जीवन फिर, मानव जग मुस्काता।
उदाहरण–20
दीपक का संकल्प अंधेरी, रातों में टिमटिम करता।
बुझ–बुझकर भी फिर जलता, संघर्षों से निस्तरता।
प्रभु–विश्वास जगाता भीतर, मन को दृढ़ता भरता।
जीवन–पथ पर चलने वाला, सत्य–धैर्य ही धरता।
हरिगीतिका छंद का रूप निर्माण (Harigitika Chhand Ka Rup Nirman)
1. संज्ञा से छंद निर्माण
-
जैसे: “भक्ति, देवी, सुरभि, सरिता”
-
इन शब्दों को इस तरह जोड़ते हैं कि कुल मात्रा 28 हो जाए।
2. विशेषण से रूप निर्माण
-
जैसे: “कोमल, मधुर, निर्मल, पावन”
-
इन विशेषणों से लयपूर्ण पंक्तियाँ बनाई जाती हैं।
3. क्रिया से छंद निर्माण
-
जैसे: “बहता, खिलता, गाता, झूमता”
-
क्रिया रूप पंक्तियों में गति और संगीत जोड़ते हैं।
4. संयोजन का नियम
एक पंक्ति = ऐसे शब्द + ऐसे संयोजन
जिससे कुल मात्रा = 28 हो जाए।
विशेषज्ञ राय
छंदों को कठिन न समझें। हरिगीतिका छंद (Harigitika Chhand) वास्तव में एक बहुत सरल, मीठा और सीखने में आसान छंद है। बस 28 मात्रा और चार चरण का नियम याद रखिए — बाक़ी सब स्वयं सहज हो जाता है।
निष्कर्ष
Harigitika Chhand (हरिगीतिका छंद) हिंदी काव्य का एक महत्वपूर्ण और मधुर रूप है।
चार चरण, 28 मात्राएँ और सुंदर लय—इतनी सी बात याद रखते ही आप इस छंद को तुरंत पहचान सकते हैं।
सीखने के बाद आप भी सुंदर भक्ति-पंक्तियाँ या गीतात्मक छंद लिख सकते हैं।
याद रखिए—अगर लय है, सरलता है और 28 मात्राएँ हैं, तो यह हरिगीतिका छंद है!
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प्रश्न–उत्तर
1: Harigitika Chhand क्या है?
उत्तर:
Harigitika Chhand एक पारंपरिक भारतीय छंद है जिसमें 4 चरण (पंक्तियाँ) होते हैं और प्रत्येक चरण में सटीक 28 मात्राएँ रहती हैं। इसका भाव बहुत मधुर, गीतात्मक और भक्ति–प्रधान होता है।
2: हरिगीतिका छंद को कैसे पहचानें?
उत्तर:
इसे पहचानने का सबसे आसान तरीका है:
-
कविता में चार पंक्तियाँ हों
-
प्रत्येक पंक्ति में 28 मात्राओं का समान संयोजन
-
लय बहुत प्रवाहपूर्ण और संगीतात्मक हो
इन तीन बिंदुओं से कोई भी छात्र आसानी से पहचान सकता है।
3: क्या हरिगीतिका छंद भक्ति गीतों में अधिक प्रयोग होता है?
उत्तर:
हाँ, बिल्कुल।
हरिगीति छंद अपने संगीतात्मक स्वर, कोमल भाव और मधुर प्रवाह के कारण विशेष रूप से भक्ति-साहित्य, कृष्ण-भक्ति, राम-भक्ति और कीर्तन में बहुत उपयोग होता है।
4: Harigitika Chhand में मात्रा कैसे गिनी जाती है?
उत्तर:
मात्रा-गणना का नियम सरल है:
-
ह्रस्व (छोटी मात्रा) = 1
-
दीर्घ (बड़ी मात्रा) = 2
हर पंक्ति की कुल मात्रा = 28 होनी चाहिए।
अगर मात्रा 27 या 29 हो जाए — तो वह हरिगीति छंद नहीं माना जाता।
5: क्या सभी पंक्तियों में शब्द समान होने चाहिए?
उत्तर:
नहीं, शब्द बदल सकते हैं।
लेकिन लय, मात्रा-गठन और प्रवाह चारों पंक्तियों में समान होना चाहिए।
यही इसकी पहचान है।
6: क्या हरिगीतिका छंद में तुकांत ज़रूरी है?
उत्तर:
तुकांत होना अनिवार्य नहीं है,
लेकिन अधिकतर कवि इसे तुकांत ही लिखते हैं
क्योंकि इससे छंद और भी मधुर हो जाता है।
7: Harigitika Chhand और Doha में क्या अंतर है?
उत्तर:
मुख्य अंतर:
-
दोहा: 2 पंक्तियाँ (24+13 मात्रा)
-
हरिगीति: 4 पंक्तियाँ (28–28–28–28 मात्रा)
लय, भाव और संरचना दोनों का अलग है।
8: क्या शुरुआती छात्र Harigitika Chhand आसानी से बना सकते हैं?
उत्तर:
हाँ!
यदि छात्र
-
28 मात्राओं की गिनती सीख लें
-
पंक्तियों को सरल शब्दों में लिखें
-
प्रवाह बनाये रखें
तो वे आसानी से Harigitika Chhand रच सकते हैं।
यह छंद शुरुआती और उन्नत — दोनों प्रकार के विद्यार्थियों के लिए बेहद अनुकूल है।
डिस्क्लेमर
यह लेख केवल अध्ययन, शिक्षण और जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें बताए गए नियम छंदशास्त्र की सामान्य परंपरा पर आधारित हैं।
